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माथे पर मत चूमना…


फोटो नंदनगढ़ के बौद्ध स्तूप(बेतिया,बिहार)के पश्चिम की दीवाल से।

डूबता एक बरस था,धुंध से आकाश और उसकी सहचरी दिशाएं ढकी थीं।व्याकुल थीं,सूरज की गर्मी को सहते-सहते।पर उनसे उबरने के कोई आसार न थें क्योंकि दिसंबर सबकुछ मानो जमा देने की गुप्त योजना में था।मई में मिले प्रेम के झरने को सफेद बर्फ की रंगहीन चादर से ढक देने के प्रयास में था,पर वहीं दूसरी ओर सर्द सुबह और शाम से जकडी धरती के तल में किसी मौसम में न जम सकने वाले अश्रुओं की नई झील बन रही थी,किसी के भी रोके जाने से न रूकने वाले समय के उसी प्रवाह में अचानक उसे लगा जैसे उसकी आत्मा को किसी ने आटे की तरह गूंद दिया हो।गेंद की तरह उछाल कर जमीन पर जोर से पटक दिया हो।ठीक भी था,जाने कितने वर्षों से वह आत्मा सो भी तो रही थी।उसे दुनिया का बिल्कुल होश नहीं था और दुनियादारी में तो वैसे भी अनाड़ी।

मानो अब तक वह एक गहरी नींद में थी और अचानक किसी ने जोर से धक्का दे दिया हो! जगने पर होश आया कि नींद में ही,जगने से पहले ही उसे अकेलेपन के बीहड़ में पटक दिया गया है।तब उसने आंसुओं से खुद के हृदय की कलुषता का आचमन करना चाहा,आत्मा का प्रक्षालन करना चाहा।पर प्रेम से भरे ह्रदय में एक बार अंधेरे के साम्राज्य स्थापित होने के बाद करोड़ों सूर्य मिलकर भी वहां उजाला नहीं कर सकते।

आखिरकार सबकुछ सर्द दिसंबर और डूबते बरस के साथ डूबते देखने के बाद जब दुनिया अपने नग्न सत्य के स्वरूप में प्रकट हुई,तब चेतना जगी कि घर भी नहीं है।कमरा जो घर था,दुनिया थी,उसकी सब दीवारें ढह चुकी हैं,छत जमीन में मिल चुकी थी और जमीन पैरों तले खिसक चुकी थी।तब लौटकर उसने अपनी एक दुनिया बनाई।बदन से खाल उतारी और उससे जमीन बना दिया,फिर अपनी गर्दन को लेकर दरवाजा बना दिया कि मुड़कर न देखना पड़े कि कौन आना चाहता है घर में।सब आंसुओ को बटोरकर स्याही बना ली और हृदय के कलम में उसे भरकर उसे ही थमा दिया।कुछ स्मृतियों को मिटा देने के फेर में,इतनी जोर से पटका सीने से निकालकर कि चारदीवारी बन गई।बोझिल मन से छत बनाया कि नये बने घर का बोझ कोई तो उठा सके।पूरब के दीवाल पर अपनी पसंद के कुछ फूल,कुछ पत्ते, पहाड़ और पहाड़ के पीछे से उगता सूरज बनाया।
कुछ मधुर स्मृतियों से बिछौना बना लिया।कटु स्मृतियों को किसे देती?कौन उसका खरीदार होता!मुफ्त में भी भला कौन लेता?सो उसको ओढ़ना बना लिया।कुछ सपने थे टूटे-बिखरे,उसे लड़कों में बांट दिया।कभी हिम्मत का अथाह सोता था उसके पास,उसे लड़कियों में बांट दिया।
अचानक एक दिन गुस्से और पीड़ा से अपने चश्मे को दीवाल पर दे मारा कि आखिर इससे साफ-साफ दिखता क्यूँ नहीं?तबसे उस दीवाल पर एक आईना बन गया,उस आईने ने दिखाया कि उसकी आत्मा का रंग कितना काला है!मारे क्षोभ के उसने वह काला रंग पूरब की दीवार पर बने सूरज पर पोत दिया।तब से सूर्योदय तो हुआ पर जीवन प्रकाशित नहीं हुआ,न आत्मा उजली हुई।
पर तब भी वह जिंदा है क्यूंकि उसे उम्मीद है गए हुए के लौट कर आने की।उसकी यह उम्मीद तब और बढ़ जाती है जब पीछे छूट गए मित्र का दुख में सन्देशा आता है कि ‘माँ नहीं रही’।तब भी जब सुख में उसका मित्र उसे उसके नाम से ही पुकार कर संदेश देता है कि जिंदगी ने एक खुशनुमा ठौर लिया हैIउसी पुरानी निश्छल अनौपचारिकता से।
और तब भी जब मर चुकी माँ सपने में आकर बगल में बिस्तर पर लेट जाती है और वह परेशान होती है कि घर आ रहे बच्चे को वह क्या कहकर अपनी ही माँ का परिचय करवाएगी? जबकि आने वाले को पता है कि माँ अब जीवित नहीं।इतने खूबसूरत और प्यारे उलझन से अब तक उसका सामना नहीं हुआ था,वह उस उलझन को बने ही रहने देना चाह रही थी पर था तो सपना ही!टूट गया,टूटना ही था।स्वप्नों का टूटना और आत्मीय अंशों का छूटना जीवन के अपरिहार्य पाठ हैं।हम कितने बार पढने पर इस पाठ को समझ जायेंगे,यह हमारी बुद्धि और कर्म पर निर्भर करता है और जैसे उपरोक्त स्वप्न स्वयं ब्रह्म देव सत्य नहीं कर सकते वैसे ही किसी के भी लौट कर आने की उम्मीद करना बेमानी है जीवन में भी।और तब से उसने उन सब पुस्तकों को छूने से एतराज किया,जिसमें किसी उम्मीद को पालने की बात हो।जाते हुए लोग बस अपना प्यार किसी दर्द की शक्ल में आत्मा में धंसाकर चले जाते हैं।
वह सोचती है कि जीवन समाप्त होने से पहले अगर उसे किसी सूत्र की व्याख्या करने का अवसर मिल सके तो वह गीत चतुर्वेदी के इस लाइन कि ‘माथे पर दिया गया चुंबन आत्मा को चूमने जैसा होता है’ की व्याख्या में बस यही टीका करना चाहेगी कि ‘एक दिन वे सब चुंबन आत्मा में धंसी कीलों में रूपायित हो जाते हैं, इसलिए किसी को चूमना तो माथे पर मत चूमना या फिर कभी छोड़ कर मत जाना’।

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