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Showing posts from November, 2025

पुस्तकें...

बचपन में मेरी और दूसरों की भी मेरे बारे में यह भावना थी कि मुझमें कुछ कम बुद्धि है।मुझे भी अपनी बुद्धि कुछ मंद ही लगती।कई बार मुझे समझ नहीं आता था फलां स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए था!लोगों की मुझसे जो अपेक्षाएं होती थीं मैं समझ न पाती थी बहुधा।जब कोई कुछ पूछता तो मुझे स्पष्ट नहीं रहता था क्या कहना है अथवा क्या उत्तर देना है।कई बार जब उत्तर देने या कुछ कहने की कोशिश की भी तो वह बहुत अस्पष्ट और उस उत्तर से दूसरों को मेरे बारे में कम बुद्धि की सोच को बल ही मिलता था।चार लोगों के बीच जाने में मेरे हाथ-पांव फूलने लगते थें।भीड़ मेरे आत्मविश्वास को रसातल में ले जाती थी।जब बचपन में कोई मज़ाक उड़ाता तो आंखें नम हो जाती थीं।कोई प्यार से बोलता तो भी आंखें नम हो जाती थीं। गांव-जवार का कोई रिश्तेदार घरपर आता तो मां से कहता कि 'तोहार दूसर लईकन जइसे अन्नू ना हईन।एनपर धियान दा'।मेरे अत्यंत दुबले होने का भी मज़ाक उड़ाया जाता या मुझपे दया दिखाई जाती।जो मुझे कुछ रोष से भर देता और मुझे स्वयं पर दया आने लगती।कुल मिलाकर ऐसा लगता,'ये दुनिया,ये महफ़िल मेरे काम की नहीं'।आभास होता कि कहीं किस...

देवभूमि_उत्तराखंड 🏞️

इस बरस जब इन पहाड़ों पर जाना हुआ तब धूप अब अपने कोमल रूप में आ गई थी और इस कोमलता ने मन की कठोरता को हर लिया था।देवभूमि के पहाड़ों-झरनों और पांत में खड़े देवदार और चीड़ के वृक्षों से मिलकर ऐसा लगता है जैसे मन के भीतर का ख़ाली कटोरा लबालब हो गया हो किसी जादुई चीज़ से।ऐसा खाली कटोरा जिसे अपने भीतर लिए हर रोज़ घूमा करती हूँ बेचैन-व्याकुल। और मेरी सब बेचैनी -व्याकुलता,सब चिंताएं,मेरे मन के सब कलुष,मेरी ईष्याएं कपूर की मानिंद उड़ जाती है देवभूमि के स्पर्श मात्र से और आत्मा ऐसे धूल कर स्वच्छ हो जाती है जैसे कभी मलिन हुई ही नहीं थी। ऐसा अनुपम सौंदर्य इस स्थल का जिसको व्यक्त करने हेतु मेरे पास वैसी भाषा नहीं है।कठोर उदासी ओढ़े अपने एकांत से घिरा हर पहाड़ साधना में रत कोई साधु जैसे दिखता है।हरे रंग को भी जो लज्जा में डाल दें ऐसी हरितिमा युक्त अरण्य।कहीं पहाड़ों का सीना छलनी करते हुए तीव्र रूप में बहते झरने हैं तो कहीं पतली-दुबली काया वाले झरने।यही हाल पहाड़ी नदियों का है।कहीं इतनी कोमल,इतनी दुबली जैसे अब अगली बार आने पर ये अदृश्य हो जावेंगी अथवा छू लेने भर से मुरझा जायेंगी!कहीं कल-कल करती इतने ...