मिट्टी का चूल्हा,आसमान का मुंह ताकती रसोई,रसोई को छत के रूप में दो नीम के पेड़ों का आसरा।चूल्हे पर पकता दाल,भूख से व्याकुल चूल्हे के पास बैठी मैं और तमाम चिंताओं को परे रख जल्दी से दाल पक जाए,(क्योंकि चावल और सब्जी तो जल्दी बन जाते लेकिन दाल में समय लगता था) इस व्यवस्था में लगी हुई 'माँ। खुला कच्चा आंगन,आंगन के उसपार ओसारे में बैठे पिता।ओसारे से रसोई तक इधर-उधर फुदकती मैं,कभी पिता को चाय देने,कभी पिता का कोई संदेश माँ को पहुंचाने के लिए।मैं थोड़ी देर रसोई में उसके पास बैठ जाती तो माँ कहती 'ज्जा ओसरवे में बइठा बाऊजी के लग्गे,थोड़के देरी में बन जाला खाना'।किंतु मुझे उसके पास बैठना अधिक अच्छा लगता था क्योंकि रसोई के छत के रूप में उन दो नीम के पेड़ों की छांव में बैठना मुझे सबसे अच्छा लगता। कारण,जगजीत सिंह की गजल, ' हम तो हैं परदेश में', में एक लाइन है-' आंगन वाली नीम पे जाकर अटका होगा चांद',गांव वाले घर के आंगन में लगे उन दो पेड़ों पर मैंने चांद को सच में अटकते हुए देखा है जाने कितनी अनगिन रातों में और इसलिए दिन के उजियारे में नीम के साथ चांद की प्रतीक्षा करत...
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