समक्ष माँ गंगा स्थिरता का भ्रम रचती हुई प्रवाहित हो रहीं हैं।सामने घाट से राजघाट तक जगमग करते घाटों की सर्पीली श्रृंखला है।पर ये सब देखते हुए मैने इन्हें नहीं देखा,बल्कि देखा एक किनारे आसमान छूती हुई एक फ्लैट गर्व से तनी हुई थी जिसकी खिड़कियों से रौशनी छन-छन कर गिर रही थी।जिसे देखते हुए तुम याद आए और तुम्हें याद करते हुए वही अनुत्तरित प्रश्न स्वयं से पूछा कि जैसे इतनी दूर से इन खिड़कियों को देखते हुए उनमें मैं तुम्हें ढूंढ रहीं हूँ,क्या तुम भी अपने घर की खिड़की से झांकते,बाहर चलते हुए लोगों में मुझे ढूंढते होगे! हेडफोन में गाना बज रहा था–'मैंने तुझे देखा.... इसमें एक लाइन है 'मैंने तुझे देखा इश्क के मलालों में',मैं अब तुम्हें वहीं देखती हूँ।और तुम भी मुझे देख रहे होगे अपने किसी कर्म की सजा में। इस दुख में पुल की रेलिंग पर हाथ धर ह्रदय को टेक देना चाहा तो पुल की धड़कनें सुनाई दीं।वही पुल जिसपर खड़ी हूँ।न जाने पुल बनाने वालों में से किसकी ह्रदय की धड़कने पुल में समा गईं कि छूट गईं,क्या मालूम!उन धड़कनों को अनसुना कर आगे बढ़ना था क्योंकि यही नियम है इस बेढ़ब-बेगढ़ संसार का...
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