गर्मियों के दिन वापस लौट आए हैं।कुछ शहरों के हाल तनिक भिन्न हो सकते हैं किंतु एक सामान्य रूप से बात यही है कि गर्मियों के दिन वापस लौट आए हैं।हालांकि ठीक-ठीक इस मौसम को नाम देने का प्रयास करें तो कह सकते हैं कि यह मौसम के संधिकाल का समय है।यह प्रवेश द्वार है गर्मियों का।अब यहां से दिनमान और लंबे होते जायेंगे,दुपहरिया अब तपेंगी,शामें बच्चों की भिन्न तरह की क्रीड़ाओं से और रात्रि चहल-पहल से भरे होंगे। वह सूरज़ जिसके भाव बढ़े थें,अब उसके भाव एकदम से उतर जायेंगे।अब उसपर मीम बनेंगे,अपशब्दों के बाण चलेंगे उसपर कि अभी कुछ दिनों पहले की बात है जब उसके न दिखने पर उसके दिख जाने की कामना करने वाला लोक,अब चाहेगा कि वह थोड़ा कम तपे। अगर हम सूर्य को देव मानते हैं तो यह देव ही बताने के लिए सबसे उपयुक्त है कि सब दिन समान नहीं होतें,समय सबका एकसा नहीं होता,देव हो,दानव हो कि मनुज!अब सब कोसेंगे गर्मियों को और जाड़े के दिनों को याद करेंगे।किंतु मैं बिल्कुल नहीं करूंगी।मुझको तो गर्मियों के लंबे दिन,तपते-झुलसते दिन ही भाते हैं। गर्मियों के लंबे तपते दिनों में एक अजीब सा खालीपन है मानो समस्त सृष्टि खालीपन से...
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