नवंबर इतना नाजुक,जैसे रूई का फाहा।इतना उदास,जैसे बचपन में बड़ी बहनों के ससुराल जाने के पहले की छाई उदासी।नवंबर इतना अनमना जैसे घर से दूर जाने के लिए ट्रेन पकड़ने से पहले की जाने वाली तैयारी का अनमनापन। नवंबर,इतना नाजुक कि छू भर ले कोई तो गल जाए।पूछ ले कोई कि कैसे हो तो बिखर जाए।कसकर बांहों में भर ले तो टूट ही जाए। नवंबर कि जब जाने वाले को रोकने के तमाम प्रयास करते हुए भी मन में खटका रहता है कि अब वो नहीं रूकेगा।नवंबर चोट लगने पर दर्द के उभरने से ठीक पहले की शून्यता जैसे। नवंबर विदा का चोट हो मानो जिसका दर्द उभरता है दिसम्बर में।नवंबर का रंग स्याह नील जैसा जो दिसम्बर की सफेदी में बदल जाता है कि जो कुछ भी अब तक जिया,उसे ढंक देने के लिए। नवंबर मेरे ह्रदय जितना खाली कि इस खालीपन में ईश्वर घर करने लगता है ...
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